Halloween party ideas 2015

प्रेमराग 
तुम्हारी आंखों का बचपन
खेलता था जब अल्हड़ खेल,
स्निग्ध संकेतों में सुकुमार,
बिछल, चल थक जाता तब हार,
छिड़कता अपना गीलापन,
उसी रस में तिरता जीवन.
तुम्हारी आंखों का बचपन!
आज भी है क्या नित्य किशोर-
उसी क्रीड़ा में भाव-विभोर-
सरलता का वह अपनापन-
आज भी है क्या मेरा धन!
तुम्हारी आंखों का बचपन!
              -- जयशंकर प्रसाद

संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अंदर
दुख-सुख की लहरों में
उठ गिर बहता जाता,
मैं सो जाता।
आंखों में भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता,
मैं सो जाता।
मेरे जीवन का खारा जल
मेरे जीवन का हलाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर बरसता
मैं सो जाता
               -- हरिवंशराय बच्चन

कौन नहीं जानता
आंखें बोलती हैं
छुपाओ रहस्यों को जितना
आंखें उतना खोलती हैं।
बंद मत करो
आंखों का यह महाकाव्य
ध्यान के आवरण में
उड़ने दो
इसके पन्ने
अचानक भाग्य की तरह आई
आंधी के वातावरण में।
                 -- भवानीप्रसाद मिश्र

घिर गया नभ,
उमड़ आए मेघ काले
भूमि के कंपित उरोजों पर झुका-सा
विशद श्वासाहत,
चितातुर
छ गया इंद्र का नील वक्ष
व्रज सा, यदि तड़ित से
झुलसा हुआ सा।
आह, मेरा श्वास है उत्तप्त
धमनियों में उमड़ आई
लहू की धार
प्यार है अभिशप्त
तुम कहां हो नारि...???
                      --अज्ञेय

रात आधी बीती होगी
थकी-हारी
नींद को मनाती आंखें
अचानक व्याकुल हो उठीं
कहीं से आवाज आई
'अरे, अभी खटिया पर पड़ी हो
'उठो! बहुत दूर जाना है
आकाशगंगा को तैरकर जाना है'
मैं हैरान होकर बोली -
'मैं तैरना नहीं जानती
पर ले चलो
तो आकाशगंगा में डूबना चाहूंगी'
एक ख़ामोशी - हल्की हंसी
' नहीं डूबना नहीं, तैरना है...
मैं हूं...ना...'
और फिर जहां तक कान पहुंचते थे
एक बांसुरी की आवाज आती रही...
                   -- अमृता प्रीतम

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