कौन है इंसान का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु ?
इंसान खुद ही अपना सबसे बड़ा मित्र या सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है - "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" (गीता 6/5)। अर्थात यह मन ही जीवात्मा का मित्र है और यही जीवात्मा का शत्रु भी है। जो मनुष्य मन को जीत लेता है उसका वह मन ही परम मित्र बन जाता है और जो मन को जीत नहीं पाता है वह अपना ही सबसे बड़ा शत्रु हो जाता है। जब हम मन को मित्र मानकर उसे जीत लेते हैं, उसकी अपार क्षमताओं को जान जाते हैं, तो जीवन के विविध क्षेत्रों में निरंतर सफल होते चले जाते हैं। वहीं अवसादग्रस्त या नकारात्मकता से युक्त मन हमारे लिए शत्रु की भूमिका निभाता है और पतन का कारण बनता है।
मन को मजबूत बनाकर हम किसी भी विषम परिस्थितियों से जूझ सकते हैं, स्वस्थ व समर्थ बने रह सकते हैं, हमेशा उमंग-उल्लास से जीवन जी सकते हैं। स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, नेपोलियन, वीर भगतसिंह, महात्मा गांधी, अब्दुल कलाम, स्टीफन हॉकिंग, वाल्टेयर आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने मन को अपना मित्र बनाकर मन की शक्ति को पहचानकर खुद को ऊंचाईयों पर स्थापित किया। दूसरी ओर मन को विषय-वासनाओं में डूबोकर, मन को अवसादग्रस्त, निराशा, तनाव, चिंता, दुर्भाव आदि नकारात्मक विचारों के साथ जीने वालों ने स्वयं अपना जीवन नरकतुल्य बना दिया। कमजोर मनोबल के कारण
मन को मजबूत बनाकर हम किसी भी विषम परिस्थितियों से जूझ सकते हैं, स्वस्थ व समर्थ बने रह सकते हैं, हमेशा उमंग-उल्लास से जीवन जी सकते हैं। स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, नेपोलियन, वीर भगतसिंह, महात्मा गांधी, अब्दुल कलाम, स्टीफन हॉकिंग, वाल्टेयर आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने मन को अपना मित्र बनाकर मन की शक्ति को पहचानकर खुद को ऊंचाईयों पर स्थापित किया। दूसरी ओर मन को विषय-वासनाओं में डूबोकर, मन को अवसादग्रस्त, निराशा, तनाव, चिंता, दुर्भाव आदि नकारात्मक विचारों के साथ जीने वालों ने स्वयं अपना जीवन नरकतुल्य बना दिया। कमजोर मनोबल के कारण
किसी भी कार्य को हम पूरा नहीं कर पाते हैं तो हम अपने मन के शत्रु हैं।
भगवान उन्हीं की सहायता करते हैं, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। हमें अपने मन की मित्र मानकर उसे सकारात्मक दिशा देकर निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
