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 विश्वास की शक्ति 



विश्वास की शक्ति समय से भी अधिक शक्तिशाली होती है। समय एक स्थायी संसाधन होता है जो हमें कभी वापस नहीं मिलता है, लेकिन विश्वास हमें संजीवनी शक्ति प्रदान करता है जो हमें कठिन स्थितियों से निकलने में मदद करती है।

जब हम अपने सपनों और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दृढ़ता से काम करते हैं तो हमारा विश्वास हमें सामर्थ्य प्रदान करता है जो हमें असफलता या कठिनाई से सामना करने में मदद करता है। विश्वास की शक्ति हमें नए संभावनाओं का सामना करने और उन्हें पूरा करने के लिए आगे बढ़ने में मदद करती है।

इसलिए, विश्वास की शक्ति समय से अधिक शक्तिशाली होती है। समय की तुलना में विश्वास हमें जीवन की भारी चुनौतियों से निपटने में मदद करता है।

धन्यवाद।

 हनुमान चालीसा - 

"लाए संजीवन लखन जियाए, 
श्री रघुवीर हरषि उर लाए 
रघुपति कीन्ही बहुत बढ़ाई, 
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई 
सहस बदन तुम्हरो यश गावे, 
अस कहि श्रीपति कंठ लगावे 
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, 
नारद सारद सहित अहीसा 
यम कुबेर दिगपाल जहां ते, 
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।"



हनुमान चालीसा की चौपाइयों में बजरंग की राम के प्रति अनन्य भक्ति का बखान किया गया महाकवि तुलसीदास ने श्रीराम के मन में हनुमान के प्रति उभरने वाले भावों का वर्णन किया है। उनके अनुसार जब लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं, तब हनुमान ने ही संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की थी। संजीवनी बूटी के प्रभाव से लक्ष्मण के आंख खोलते ही हर्षाए श्रीराम हनुमान को गले लगाकर त्रिभुवन के देवताओं से उनकी तारीफ करके उन्हें अपने प्रिय भाई भरत के समान संज्ञा देते हैं, इसीलिए शास्त्रों में हनुमान की आराधना प्राणरक्षक मानी गई है। 
प्रफुल्लित श्रीराम हनुमान की भक्ति से प्रसन्न होकर बार-बार उन्हें अपने गले लगाते हैं। इसी तरह तीनों लोकों के लाखों नर-नारी हनुमान के यश का गुणगान करते रहते हैं। हनुमान के भक्त साधारण मानव से लेकर महाज्ञानी नारद सहित हजारों ऋषि-मुनि, तपस्वी यहां तक कि ब्रह्मा जैसे त्रिकालज्ञ भी हैं, जो हनुमान की महिमा का बखान कर अपने आपको धन्य मानते हैं। 
मृत्यु के देवता यम, देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर और ब्रह्मांड की चारों ओर से रक्षा करने वाले दिगपाल भी हनुमान की शक्तियों और श्रीराम के प्रति उनकी अपार भक्ति को देखकर उनकी आराधना किए नहीं रह सके।



इंसान खुद ही अपना सबसे बड़ा मित्र या सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है - "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" (गीता 6/5)। अर्थात यह मन ही जीवात्मा का मित्र है और यही जीवात्मा का शत्रु भी है। जो मनुष्य मन को जीत लेता है उसका वह मन ही परम मित्र बन जाता है और जो मन को जीत नहीं पाता है वह अपना ही सबसे बड़ा शत्रु हो जाता है। जब हम मन को मित्र मानकर उसे जीत लेते हैं, उसकी अपार क्षमताओं को जान जाते हैं, तो जीवन के विविध क्षेत्रों में निरंतर सफल होते चले जाते हैं। वहीं अवसादग्रस्त या नकारात्मकता से युक्त मन हमारे लिए शत्रु की भूमिका निभाता है और पतन का कारण बनता है।
मन को मजबूत बनाकर हम किसी भी विषम परिस्थितियों से जूझ सकते हैं, स्वस्थ व समर्थ बने रह सकते हैं, हमेशा उमंग-उल्लास से जीवन जी सकते हैं। स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, नेपोलियन, वीर भगतसिंह, महात्मा गांधी, अब्दुल कलाम, स्टीफन हॉकिंग, वाल्टेयर आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने मन को अपना मित्र बनाकर मन की शक्ति को पहचानकर खुद को ऊंचाईयों पर स्थापित किया। दूसरी ओर मन को विषय-वासनाओं में डूबोकर, मन को अवसादग्रस्त, निराशा, तनाव, चिंता, दुर्भाव आदि नकारात्मक विचारों के साथ जीने वालों ने स्वयं अपना जीवन नरकतुल्य बना दिया। कमजोर मनोबल के कारण
किसी भी कार्य को हम पूरा नहीं कर पाते हैं तो हम अपने मन के शत्रु हैं।
भगवान उन्हीं की सहायता करते हैं, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। हमें अपने मन की मित्र मानकर उसे सकारात्मक दिशा देकर निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।