नवरात्रि आद्य शक्ति मां दुर्गा की उपासना का महापर्व है। प्रतिवर्ष यह उत्सव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक चलता है। चैत्र के नवरात्र को वासंती नवरात्र व आश्विन के नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहते हैं।
हमारे शास्त्रों में दुर्गा यानि शक्ति को माता व रक्षक माना है। नवरात्रि महज नौ दिन का उत्सव नहीं बल्कि बेला है अपने अंदर सोई हुई शक्ति के जागरण का। आज सर्वत्र पाप, अनाचार, काम, क्रोध, द्वेष, दुर्भाव अपनी जड़े फैला रहा है ऐसे में नारी शक्ति ही वो जीवनदायिनी शक्ति है जो इनका संहार कर सकती है। इसी शक्ति से जग में जीवन का संचार और विकास की सतत धारा प्रवाहमान रहती है।
'दुर्गा सप्तशती' में 'दुर्गा महात्म्य' के संदर्भ प्रसंग आता है कि शुंभ निशुंभ तथा महिषासुर आदि राक्षसों के आतंक से मानव समाज थर थर कांपने लगा। इससे निजात पाने सभी देवताओं ने आद्य शक्ति भगवती दुर्गा की उपासना की।
मां दुर्गा ने इन असुरों का संहार कर जगत को इनके आतंक से मुक्ति दिलाई।मार्कण्डेय पुराण में नव दुर्गा के नाम व क्रम का उल्लेख मिलता है जिनकी नवरात्रि में आराधना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।
तदनुसार -
प्रथम शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्मान्देति चतुर्थ्कम्।।
पञ्चम स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायिनि च.सप्तम कालरात्रि महगौरिति चाष्टमम्।।
नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तितः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणेव महात्मना।।
अर्थात देवी के नौ रूप हैं जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनमें पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कुष्मांडा, पांचवी स्कंद माता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी तथा नवीं सिद्धि दात्री के नाम से प्रसिद्ध है। ये सभी ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित दुर्गा के स्वरूप हैं।
हमारे शास्त्रों में दुर्गा यानि शक्ति को माता व रक्षक माना है। नवरात्रि महज नौ दिन का उत्सव नहीं बल्कि बेला है अपने अंदर सोई हुई शक्ति के जागरण का। आज सर्वत्र पाप, अनाचार, काम, क्रोध, द्वेष, दुर्भाव अपनी जड़े फैला रहा है ऐसे में नारी शक्ति ही वो जीवनदायिनी शक्ति है जो इनका संहार कर सकती है। इसी शक्ति से जग में जीवन का संचार और विकास की सतत धारा प्रवाहमान रहती है।
'दुर्गा सप्तशती' में 'दुर्गा महात्म्य' के संदर्भ प्रसंग आता है कि शुंभ निशुंभ तथा महिषासुर आदि राक्षसों के आतंक से मानव समाज थर थर कांपने लगा। इससे निजात पाने सभी देवताओं ने आद्य शक्ति भगवती दुर्गा की उपासना की।
मां दुर्गा ने इन असुरों का संहार कर जगत को इनके आतंक से मुक्ति दिलाई।मार्कण्डेय पुराण में नव दुर्गा के नाम व क्रम का उल्लेख मिलता है जिनकी नवरात्रि में आराधना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।
तदनुसार -
प्रथम शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्मान्देति चतुर्थ्कम्।।
पञ्चम स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायिनि च.सप्तम कालरात्रि महगौरिति चाष्टमम्।।
नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तितः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणेव महात्मना।।
अर्थात देवी के नौ रूप हैं जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनमें पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कुष्मांडा, पांचवी स्कंद माता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी तथा नवीं सिद्धि दात्री के नाम से प्रसिद्ध है। ये सभी ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित दुर्गा के स्वरूप हैं।
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