आज प्राकृतिक परिवेश में बहने वाली नदियों का जल जिस स्तर तक प्रदूषित हो चुकी है, इस स्थिति में विश्वव्यापी उस चेतावनी को हकीकत समझें कि 21 वीं सदी का सबसे गंभीर संकट " जल संकट" होने वाला है। ' जल ही जीवन है' केवल नारा नहीं, एक सत्य है। आज भी परग्रही जीवन की तलाश की जाती है तो सबसे पहले जीवन के लिए अनिवार्य 'जल' के संकेत ढूंढ़े जाते हैं।
हमारी धरती पर भी मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे-किनारे हुआ है। लेकिन सभ्यता के विकास के साथ साथ आज ऐसा लगता है कि यह विकास विनाश की दिशा पर चल पड़ा है। आज देश की अधिकांश नदियों की दुर्दशा देखकर कोई भी बुजुर्ग बरबस कह उठेगा, हमारे जमाने में यह नदी ऐसी तो नहीं थी। दिसंबर- जनवरी से पहले ही जलधाराओं का सूखना एवं शेष जल का प्रदूषित हो जाना, यदि यही विकास है तो हमें अपनी गतिविधियों पर पुनर्विचार करना होगा। वनों के बेतहाशा विनाश के चलते पत्थर टूट-टूटकर रेत बन नदियों में समाते गये जिससे उनमें उथलापन आ गया।
बांध एक आवश्यकता है लेकिन नदी में प्रवाह रहना भी जरूरी है। इस सत्य को समझते हुए दोनों के बीच समन्वय वाली जलनीति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। जीवनदायिनी नदियों को स्वयं बर्बाद करने पर तुले लोगों को रोकने के लिए शासकीय प्रयासों के अलावा जनजागरण अत्यंत आवश्यक है अन्यथा इस सदी के सबसे बड़े संकट का सामना करने के लिए हमें तैयार रहना होगा।
बांध एक आवश्यकता है लेकिन नदी में प्रवाह रहना भी जरूरी है। इस सत्य को समझते हुए दोनों के बीच समन्वय वाली जलनीति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। जीवनदायिनी नदियों को स्वयं बर्बाद करने पर तुले लोगों को रोकने के लिए शासकीय प्रयासों के अलावा जनजागरण अत्यंत आवश्यक है अन्यथा इस सदी के सबसे बड़े संकट का सामना करने के लिए हमें तैयार रहना होगा।
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