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 हनुमान चालीसा - 

"लाए संजीवन लखन जियाए, 
श्री रघुवीर हरषि उर लाए 
रघुपति कीन्ही बहुत बढ़ाई, 
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई 
सहस बदन तुम्हरो यश गावे, 
अस कहि श्रीपति कंठ लगावे 
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, 
नारद सारद सहित अहीसा 
यम कुबेर दिगपाल जहां ते, 
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।"



हनुमान चालीसा की चौपाइयों में बजरंग की राम के प्रति अनन्य भक्ति का बखान किया गया महाकवि तुलसीदास ने श्रीराम के मन में हनुमान के प्रति उभरने वाले भावों का वर्णन किया है। उनके अनुसार जब लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं, तब हनुमान ने ही संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की थी। संजीवनी बूटी के प्रभाव से लक्ष्मण के आंख खोलते ही हर्षाए श्रीराम हनुमान को गले लगाकर त्रिभुवन के देवताओं से उनकी तारीफ करके उन्हें अपने प्रिय भाई भरत के समान संज्ञा देते हैं, इसीलिए शास्त्रों में हनुमान की आराधना प्राणरक्षक मानी गई है। 
प्रफुल्लित श्रीराम हनुमान की भक्ति से प्रसन्न होकर बार-बार उन्हें अपने गले लगाते हैं। इसी तरह तीनों लोकों के लाखों नर-नारी हनुमान के यश का गुणगान करते रहते हैं। हनुमान के भक्त साधारण मानव से लेकर महाज्ञानी नारद सहित हजारों ऋषि-मुनि, तपस्वी यहां तक कि ब्रह्मा जैसे त्रिकालज्ञ भी हैं, जो हनुमान की महिमा का बखान कर अपने आपको धन्य मानते हैं। 
मृत्यु के देवता यम, देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर और ब्रह्मांड की चारों ओर से रक्षा करने वाले दिगपाल भी हनुमान की शक्तियों और श्रीराम के प्रति उनकी अपार भक्ति को देखकर उनकी आराधना किए नहीं रह सके।

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