हरसिंगार का
नि: शब्द निशा में
चुपके से
झरने जैसा
होता है प्रेम...
कड़ी धूप में
गुलमोहर का
और सुर्ख होकर
खिलखिलाने जैसा
होता है प्रेम...
ओस की बूंद का
पत्ती की नोक पर
जगमगाने जैसा
होता है प्रेम...
धूप पर सवार
रंगों को समेट
तस्वीर बनाने जैसा
होता है प्रेम...
बसंत के विश्वास में
पतझड़ में
पत्ते गिरा देने जैसा
होता है प्रेम...
नि: शब्द निशा में
चुपके से
झरने जैसा
होता है प्रेम...
कड़ी धूप में
गुलमोहर का
और सुर्ख होकर
खिलखिलाने जैसा
होता है प्रेम...
ओस की बूंद का
पत्ती की नोक पर
जगमगाने जैसा
होता है प्रेम...
धूप पर सवार
रंगों को समेट
तस्वीर बनाने जैसा
होता है प्रेम...
बसंत के विश्वास में
पतझड़ में
पत्ते गिरा देने जैसा
होता है प्रेम...
-- उमेश कुमार

Post a Comment