'रविवार' और 'कविता' यानि सरसता से परिपूर्ण उमंगित दिन। जी हां, अब ' सफलता सूत्र' पर कविता हर रविवार, स्तंभ - 'एक कविता का वादा है तुमसे' के अंतर्गत।
प्रस्तुत है इस स्तंभ की पहली कविता 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)' के सुअवसर पर नारी को समर्पित...
प्रस्तुत है इस स्तंभ की पहली कविता 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)' के सुअवसर पर नारी को समर्पित...
सूखी नदी
''जब मैं सागर थीतब
समाहित होती थी
सैकडों जलधाराएँ
मुझमें आकर,
क्रीड़ाएं करते थे
असंख्य लहरें
मेरी आँचल के
हर छोर पर,
मेरा ही अंश लेकर
इठलाते थे मेघ
ऊँचे आकाश पर,
श्रृंगार करते थे
सूरज-चाँद-सितारे
मुझमें अपना
प्रतिबिम्ब निहारकर,
मेरे विस्तार की
सराहना होती थी
सर्वत्र,
पर अब
मै सागर नहीं रही
अब मैं
सूखी नदी हो गयी हूँ
जहां पर
दृष्टि नहीं जाती है
किसी की...''
-- उमेश कुमार
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