भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, वैसे संविधान सभा के 284 सदस्यों द्वारा इस पर अपने दस्तखत 24 जनवरी 1950 को ही किए गये थे। संविधान निर्माण में दो वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे।
आज से 67 वर्ष पहले जब हम समूची दुनिया पर एक महान लोकतंत्र के रूप में अपनी नई पहचान लेकर उभरे थे, तब से लेकर आज तक हजारों चुनौतियां सामने आने के बाद भी हम इस लोकतंत्र के बदौलत उम्मीदों के अनंत आकाश में नित नवीन ऊंचाईयां छूने अविराम अग्रसर हैं।
आज विश्व एक ध्रुवीय हो गई है, लेकिन हम न केवल अपने लोकतंत्र को कायम रखने में सफल रहे है, अपितु तमाम विषम परिस्थितियों के बाद भी उसे और भी परिपक्व बना रहे हैं। समूचा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस सत्य को आज स्वीकारने लगी है। अब हम गरीब एवं पिछड़ेपन की संज्ञा से मुक्त होकर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहे हैं। विकासशील से विकसित होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। वैश्विक परिदृश्य में हमारी प्रभावी उपस्थिति अब किसी से छिपी नहीं है।
हमारी सफलताओं पर दृष्टिपात किया जाये तो हम पाएंगे की वर्तमान में शायद ही कोई अंतर्राष्ट्रीय मंच हमारी उपेक्षा या अवहेलना का जोखिम मोल ले सके। यह सच है कि देश के कई इलाकों की आबादी अशिक्षा, अस्वस्थता, शुद्ध जल की कमी, भूख, गरीबी, अन्धविश्वास, कुरीतियों आदि समस्याओं से जूझ रही है। और इन सबसे निपटने के लिए आगत भविष्य में हमें
काफी लंबा रास्ता तय करना है।
आइए, गणतंत्र दिवस के इस सुअवसर पर हम अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को समझें और संकल्प लें कि अपने संविधान निर्माताओं का स्वप्न साकार करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत को विकसित, आत्मनिर्भर तथा सामाजिक समरसता से परिपूर्ण राष्ट्र बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।
आज से 67 वर्ष पहले जब हम समूची दुनिया पर एक महान लोकतंत्र के रूप में अपनी नई पहचान लेकर उभरे थे, तब से लेकर आज तक हजारों चुनौतियां सामने आने के बाद भी हम इस लोकतंत्र के बदौलत उम्मीदों के अनंत आकाश में नित नवीन ऊंचाईयां छूने अविराम अग्रसर हैं।
आज विश्व एक ध्रुवीय हो गई है, लेकिन हम न केवल अपने लोकतंत्र को कायम रखने में सफल रहे है, अपितु तमाम विषम परिस्थितियों के बाद भी उसे और भी परिपक्व बना रहे हैं। समूचा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस सत्य को आज स्वीकारने लगी है। अब हम गरीब एवं पिछड़ेपन की संज्ञा से मुक्त होकर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहे हैं। विकासशील से विकसित होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। वैश्विक परिदृश्य में हमारी प्रभावी उपस्थिति अब किसी से छिपी नहीं है।
हमारी सफलताओं पर दृष्टिपात किया जाये तो हम पाएंगे की वर्तमान में शायद ही कोई अंतर्राष्ट्रीय मंच हमारी उपेक्षा या अवहेलना का जोखिम मोल ले सके। यह सच है कि देश के कई इलाकों की आबादी अशिक्षा, अस्वस्थता, शुद्ध जल की कमी, भूख, गरीबी, अन्धविश्वास, कुरीतियों आदि समस्याओं से जूझ रही है। और इन सबसे निपटने के लिए आगत भविष्य में हमें
काफी लंबा रास्ता तय करना है।
आइए, गणतंत्र दिवस के इस सुअवसर पर हम अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को समझें और संकल्प लें कि अपने संविधान निर्माताओं का स्वप्न साकार करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत को विकसित, आत्मनिर्भर तथा सामाजिक समरसता से परिपूर्ण राष्ट्र बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।

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