अधर्म पर धर्म की विजय सुनिश्चित है। जब-जब संसार में अन्याय, अधर्म और असत्य बढ़ता है तो भगवान धरती पर अवतरित होकर न्याय, धर्म और सत्य का साम्राज्य स्थापित करते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है -
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धर्म की संस्थापना एवं साधु-सज्जनों के रक्षार्थ हुआ था। पुराणों तथा श्रीमद्भागवत के अनुसार द्वापर युग में जब पृथ्वी पर अत्याचार और अन्याय चरम पर पहुंच गये तो भगवान कृष्ण ने दुष्ट राक्षसों का संहार कर अपने भक्त की रक्षा करने अवतार लिया।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो समग्र जीवन को स्वीकारते हैं। वे जीवन के हर रंग में हैं। वर्तमान में जब सर्वत्र भय,आशंका और निराशा व्याप्त है। जहां प्रेम और कर्म का पक्ष विकृत हो चला है, ऐसे में भगवान कृष्ण के उपदेशों और आदर्शों को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर जन सामान्य के कल्याण के लिए अपनाने की अधिक आवश्यकता है।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धर्म की संस्थापना एवं साधु-सज्जनों के रक्षार्थ हुआ था। पुराणों तथा श्रीमद्भागवत के अनुसार द्वापर युग में जब पृथ्वी पर अत्याचार और अन्याय चरम पर पहुंच गये तो भगवान कृष्ण ने दुष्ट राक्षसों का संहार कर अपने भक्त की रक्षा करने अवतार लिया।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो समग्र जीवन को स्वीकारते हैं। वे जीवन के हर रंग में हैं। वर्तमान में जब सर्वत्र भय,आशंका और निराशा व्याप्त है। जहां प्रेम और कर्म का पक्ष विकृत हो चला है, ऐसे में भगवान कृष्ण के उपदेशों और आदर्शों को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर जन सामान्य के कल्याण के लिए अपनाने की अधिक आवश्यकता है।

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